मन के जीते जीत है ।मन के हारे हार ।

छानबे। विजयपुर स्थित झोरिया महादेवन आश्रम पर विशाल भण्डारे का आयोजन किया गया था जिसमे अड़गड़ानंद महराज ने लगभग 12 बजे आश्रम पर पधारे कुछ देर आराम करने के बाद आश्रम पर उपस्थित भक्तो को सुमधुर बाणी से सींचे ।अपने सुमधुर प्रबचन में महराज ने मन को जीतने की बात कही जिसमे कहे कि मन के जीते जीत है ।मन के हारे हार ।। तेरा मन दर्पण कहलाये । देखे और दिखाये ।। परमब्रह्म को पाइय परम ब्रह्म की प्रीति ।। प्राणी ने जब प्रभु से प्रभु के पाने के उपाय को पूछा तो प्रभु ने कहा कि अपने मन को पकड़ लो प्रभु को पा जाओगे ।मन ही देवता मन ही ईश्वर मन से बड़ा न कोई ।प्रभु को जो जान लिया उसको और कुछ जानने की जरुरत नही । सोई जानय जेहि दैव जनाई । जानत तुम्हहि तुम्हहि होई जाई।। काम क्रोध लोभ मन के नैन हजार। भजन बिन बावरो कभी ना हरि गुन गायो खटी खटी मरो बैल की नाइ। सुख की कलिया दुख के काटे मन की ये बात । अंत मे महराज जी ने कहा कि आप की धर्म शास्त्र गीता है भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया गया है गीता ज्ञान है अमृत वाणी है यथार्थ गीता का पठन पठान अवश्य करे। इस मौके पर महराज जी के साथ तुलसी बाबा भवानंद बाबा तानसेन बाबा आशीष बाबा नर्बदा महराज सोहम बाबा जी व आश्रम में सहयोगी के रूप में भगवती सिंह मैनेजर पांडेय गुड्डू चौबे राजन चौबे शेषधर पांडेय सुरेश सोनकर समेत सैकड़ो कार्यकर्ता लगे रहे ।व हजारो की संख्या में भक्तों ने प्रसाद ग्रहण किए तथा अड़गड़ानंद महराज का प्रबचन सुन पुण्य के भागी बने ।

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