समाचारजड़ता ही दुःख प्रदान करती है-अनंतश्री विभूषित काशीधर्मपीठाधीश्वर

जड़ता ही दुःख प्रदान करती है-अनंतश्री विभूषित काशीधर्मपीठाधीश्वर

मिर्जापुर। भगवान की जितनी भी लीलाएँ गाई जाती हैं, उनका उद्देश्य उनसे संबंध जोड़ने का होता है। परमात्मा अपने भक्तों को आनंद प्रदान करने के लिए अवतार ग्रहण करते हैं। भक्तों में अनंत शक्ति होती है। भक्तिमयी माँ यशोदा ने इसी भक्ति भाव से भगवान कृष्ण को ऊखल से बांध लिया था और ज्ञान के प्रतीक नंदबाबा उस बंधन को छोड़ते हैं। सकटासुर वध हो साक्षात जड़वाद का खण्डन है। केवल अपनी सुख-सुविधाओं को चाहने वालों को जड़ कहा जाता है। जड़ता ही दुःख प्रदान करती है। वत्सासुर, वृषभासुर, अघासुर, व्योमासुर, केशी और कालिका नाग दमन की कथाएँ अपनी प्रतीकात्मकता एवं आध्यात्मिकता के लिए सदैव स्मरणीय हैं। देवराज इंद्र का मान मर्दन यह शिक्षा देता है कि रूढ़िवादिता भगवततत्व की प्राप्ति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधक है। उक्त बातें पूज्यपाद अनंतश्री विभूषित काशीधर्मपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नारायणानंद तीर्थ महाराजश्री ने सिटी विकासखंड के रायपुर पोख्ता ग्राम के शंकराचार्य आश्रम परिसर में चल रहे श्रीमद्भागवत ज्ञानयज्ञ सप्ताह के छठवें दिन शुक्रवार को कही।
स्वामी जी ने आगे बताया कि गोपियाँ चित्त वृत्तियाँ हैं। चित्त-वृत्ति हमेशा आत्मा के साथ रहना चाहती है। रास हृदय का उल्लास विचार है। रासलीला में भक्ति आनंद की चरम सीमा है। यह भगवान की चिन्मयी आनंद लीला है। यह प्रेममयी लीला है और प्रेम का साकार स्वरूप है सेवा। व्यापक दृष्टि ही व्यापक तत्त्व है। मैं मेरे पन का त्याग करने वाला महान होता है। भागवत में जितने भी असुर हैं सभी भगवान के मार्ग में अवरोधक हैं। अतः भगवत तत्व को चाहने वालों को बुराइयों से लड़ना ही पड़ेगा। भागवत में न सिर्फ सभी का परमार्थ है बल्कि उसमें व्यावहारिक तत्व भी है। यह तत्त्व हमें बताता है कि जीवन में हमेशा समता और सरसता विद्यमान रहनी चाहिए।
उद्धव एवं गोपी संवाद का वर्णन करते हुए महाराजश्री ने कहा कि उद्धव को अपने ज्ञान एवं बुद्धि का बड़ा अभिमान था। वह प्रेम अर्थात भाव को तुच्छ समझते थे। उद्धव के अहम को नष्ट करने के लिए श्रीकृष्ण ने उन्हें गोपियों के पास भेजा। गोपियों का श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम देखकर उद्धव के भीतर गोपियों के प्रति ‎‎धन्यता का भाव जागने लगा। उन्हें लगा बड़े-बड़े योगी और साधु समाधि लगाकर संसार को भुलाने और अपने आराध्य में ध्यान लगाने की कोशिश करते हैं, लेकिन सफल नहीं हो पाते। उनकी वृत्तियां प्रभुमय नहीं हो पातीं, जबकि गोपियां स्मृति कराने पर भी संसार को याद नहीं कर पातीं। उनका ध्यान एक पल भी श्रीकृष्ण से अलग नहीं होता। गोपियों के प्रेम के प्रति उद्धव के मन में आदरभाव पनप उठा।
ज्ञान से बंजर हुए मस्तिष्क में प्रेम का अंकुर फूट पड़ा। ज्ञान की गूदड़ी में उन्हें प्रेम का हीरा मिल गया। उद्धव शांत हो गए। उन्हें लगा कि उन्होंने ज्ञानार्जन तो बहुत किया, लेकिन ज्ञानानुभव आज ही हुआ। उनका मन श्रद्धा से भर उठा। मस्तक वृंदावन की प्रेम भूमि पर नत हो गया। उक्त कार्यक्रम का आयोजन नारायण सेवा समिति द्वारा किया गया, जिसमें समिति के समस्त पदाधिकारी एवं अन्यान्य
भक्तों ने पादुका पूजन व माल्यार्पण कर सत्संग लाभ प्राप्त किया।

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