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मजबूत सरकार की नीतियों का परिणाम है कि आज हिंदुस्तान समूचे विश्व में शांतिदूत का प्रतिनिधि है जेडब्ल्यूएस



मजबूत सरकार की नीतियों का परिणाम है कि आज हिंदुस्तान समूचे विश्व में शांतिदूत का प्रतिनिधि है जेडब्ल्यूएस

हिंदुस्तान की तेजतर्रार मजबूत नीति का परिणाम कि आज समूचे विश्व में हिंदुस्तान शांति दूत बना हुआ है।
मजबूत लोकतंत्र के निर्णय लेने की क्षमता का परिणाम है कि आज लोकहित के लिए सभी के सामने मजबूती से काम भी कर रहा है। दूरदृष्टि पक्का इरादा सभी का साथ सभी का विश्वास और सभी के विकास नीति और भी व्यापक होने लगी है।
मोदी सरकार की नीति सबका साथ सबका विश्वास सबका विकास अब मानो राष्ट्रीय नीति में तब्दील हो चुका है। उपरोक्त बातें जर्नलिस्ट वेलफेयर सोसाइटी के द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताई गई।
पीएफआई को लेकर इस वक्त समूचे भारत में राजनीतिक जंग छिड़ा हुआ है। दौलत खान महासचिव सूफी इस्लामिक बोर्ड कर्नाटक के मुताबिक
उनको पीएफआई ज्वाइन करने के बाद संदिग्ध परिस्थितियों का आकलन हुआ और उन्होंने पीएफआई जैसे संगठन से सदस्यता त्याग दी।
2007 में दौलत खान केएफडी जो कि कर्नाटक में पीएफआई का पुराना नाम है ज्वाइन किया था और अक्टूबर 2008 तक दौलत खान इसका हिस्सा रहे ।

दौलत खान कर्नाटक के सेंट्रल बेंगलुरु के शिवा जी नगर के पी एफ आई सेक्रेटरी के पद पर काम किया है । लगभग डेढ़ से दो सालों के दौरान उन्होंने यह देखा कि पीएफआई कट्टरपंथ को बढ़ावा देने के लिए काम करती है और बहुत सारे सूफी संप्रदाय के युवकों को कट्टरता की ओर ढकेलती है और दौलत खान का मानना था कि सूफीवाद ही वह इकलौता रास्ता है जिससे इस्लाम की छवि सुधारी जा सकती है और कट्टरता को रोका जा सकता है ।

दौलत खान ने उस समय के पी एफ आई की राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति के सदस्य मौलाना उस्मान बेग से जब यह बात कही कि हमारी टॉप लीडरशिप में सूफियों का प्रतिनिधित्व क्यों नहीं है और कट्टरपंथी विचारधारा के लोग क्यों अधिक हैं उन्होंने उस समय इसका कोई जवाब नहीं दिया और कहा कि ज्यादातर सूफी संप्रदाय के लोग हमारे साथ जुड़ते नही है । फिर दौलत खान उन्हें कुछ नाम सुझाए जिन्हें मौलाना उस्मान बेग ने बिना सोचे समझे रिजेक्ट कर दिया । इन डेढ़ से 2 साल के दौरान पीएफआई को दौलत खान द्वारा बहुत नजदीक से देखा और यह दौलत खान का मानना था की पी एफ आई कट्टरपंथ को बढ़ावा देने वाली विचारधारा का समर्थन करता है जो यह सिखाता है कि जो भी काफिर है चाहे शिया हो , सुन्नी हो , सूफी हो या गैर मुस्लिम हो उसको मार देने में कोई हर्ज नहीं हैं और इस्लाम के सिद्धांतों के अनुरूप है । जबकि दौलत खान दिल से सूफी संप्रदाय को मानने वाले थे।
उनके मुताबिक क्योंकि सूफी शिक्षाएं कभी भी किसी भी व्यक्ति को मारने के लिए अनुमति नहीं देती है ना किसी से नफरत करने के लिए । जब दौलत खान ने देखा की पीएफआई सूफी विचारों को ना मानकर कट्टरपंथ के रास्ते पर चलेगी तो मैंने पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया को छोड़ दिया।

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