
दिव्या मित्तल की लोकप्रियता से गरमाई सियासत, सेल्फी की होड़ ने बढ़ाई राजनीतिक दलों की चिंता!
नौ दिनों से मिर्जापुर में जनसंपर्क, हर कार्यक्रम में उमड़ रहा लोगों का उत्साह; 2027 में पारंपरिक दलों को चुनौती दे पाएंगी पूर्व जिलाधिकारी?
मिर्जापुर। पूर्व आईएएस अधिकारी और मिर्जापुर की पूर्व जिलाधिकारी दिव्या मित्तल जहां पहुंच रही हैं, वहां उनके साथ सेल्फी लेने और तस्वीर खिंचवाने वालों की होड़ दिखाई दे रही है। कुछ ही समय पहले तक जिले की प्रशासनिक कमान संभालने वाली दिव्या मित्तल को अपने बीच पाकर लोग उत्साहित नजर आ रहे हैं। उनके साथ फोटो खिंचवाने की उत्सुकता और विभिन्न कार्यक्रमों में लोगों की भागीदारी ने जिले के राजनीतिक माहौल में नई चर्चा छेड़ दी है।
दिव्या मित्तल पिछले नौ दिनों से मिर्जापुर में विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल होकर लोगों से संपर्क कर रही हैं। उनकी लोकप्रियता का एक पहलू यह भी है कि राजनीति में आने और अपनी पार्टी ‘जन नीति भारत’ की घोषणा करने के बाद भी लोगों के एक बड़े वर्ग की नजर में उनकी पहचान एक कुशल, सक्रिय और जनसमस्याओं को समझने वाली प्रशासनिक अधिकारी के रूप में बनी हुई है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रशासनिक सेवा के दौरान बनी इस पहचान को वह चुनावी समर्थन में कितना बदल पाती हैं। क्या उनकी लोकप्रियता पारंपरिक राजनीतिक दलों के समीकरण बिगाड़ सकती है, या फिर चुनावी राजनीति का जटिल चक्रव्यूह उनके सामने बड़ी चुनौती बनकर खड़ा होगा?
सेल्फी से सियासी संदेश तक, क्या लोकप्रियता वोट में बदलेगी?
दिव्या मित्तल के साथ तस्वीर खिंचवाने की होड़ को केवल व्यक्तिगत लोकप्रियता तक सीमित करके नहीं देखा जा रहा है। उनके समर्थकों और राजनीतिक हलकों में इसे जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, किसी अधिकारी के प्रति सम्मान और किसी राजनीतिक दल को वोट देने का निर्णय अलग-अलग बातें हैं।
मिर्जापुर में जिलाधिकारी रहते हुए दिव्या मित्तल की पहचान खास तौर पर हलिया क्षेत्र के दुर्गम गांव लहुरियादह में पेयजल की समस्या के समाधान के प्रयासों से जुड़ी रही है। इस गांव में पाइपलाइन के जरिए पानी पहुंचाने की पहल ने उन्हें व्यापक चर्चा दिलाई थी। यही प्रशासनिक छवि अब उनकी राजनीतिक यात्रा में पूंजी साबित हो सकती है।
लेकिन चुनावी राजनीति में लोकप्रिय चेहरा होना ही पर्याप्त नहीं होता। बूथ स्तर पर संगठन, कार्यकर्ताओं का नेटवर्क, स्थानीय मुद्दों की समझ, संसाधन और मतदाताओं के बीच लगातार संवाद भी महत्वपूर्ण होते हैं। दिव्या मित्तल के सामने चुनौती होगी कि वह कार्यक्रमों में दिखाई दे रहे उत्साह को स्थायी जनसमर्थन में कैसे बदलती हैं।
‘जन नीति भारत’ के जरिए 2027 की तैयारी, दिग्गजों के सामने नई चुनौती?
15 अक्टूबर को अपनी नई राजनीतिक पार्टी ‘जन नीति भारत’ की घोषणा कर दिव्या मित्तल ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी स्वतंत्र पारी शुरू करने का ऐलान किया। उन्होंने 2027 के विधानसभा चुनाव में उतरने की बात कही है। मिर्जापुर से चुनाव लड़ने की उनकी घोषणा ने जिले की राजनीति में इस चर्चा को और तेज कर दिया है।
अब सवाल यह है कि यदि वह मिर्जापुर नगर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतरती हैं, तो भाजपा, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस जैसे स्थापित दलों के सामने कैसी चुनौती खड़ी होगी? क्या उनकी प्रशासनिक छवि और जनता से सीधे जुड़ने की शैली मतदाताओं को आकर्षित कर पाएगी? या फिर स्थापित दलों का संगठन और परंपरागत चुनावी समीकरण उनके रास्ते में बाधा बनेंगे?
दिव्या मित्तल की राजनीतिक लहर में कौन-कौन से दिग्गज प्रभावित होंगे, इसकी चर्चा अभी से शुरू हो गई है। हालांकि, किसी नेता की हार-जीत का अनुमान लगाने के लिए अभी समय है। असली तस्वीर चुनावी मैदान में उनके संगठन, उम्मीदवारों, स्थानीय समीकरणों और मतदाताओं के रुझान से ही स्पष्ट होगी।
मेरठ से मिर्जापुर और देवरिया तक प्रशासनिक अनुभव
दिव्या मित्तल उत्तर प्रदेश कैडर की 2013 बैच की आईएएस अधिकारी रही हैं। अपने प्रशासनिक कार्यकाल में उन्होंने मेरठ में संयुक्त मजिस्ट्रेट, गोंडा में मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ), कानपुर में यूपीएसआईडीसी की संयुक्त प्रबंध निदेशक और बरेली विकास प्राधिकरण में उपाध्यक्ष जैसे पदों पर जिम्मेदारी निभाई।
वह संत कबीर नगर, मिर्जापुर और देवरिया की जिलाधिकारी भी रह चुकी हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने नीति आयोग में सहायक सचिव और उत्तर प्रदेश शासन के राजस्व विभाग में विशेष सचिव के रूप में भी कार्य किया। मिर्जापुर में उनका कार्यकाल सितंबर 2022 से सितंबर 2023 तक रहा, जबकि देवरिया में उन्होंने जुलाई 2024 से मई 2026 तक जिलाधिकारी की जिम्मेदारी संभाली।
30 अगस्त 2026 को उन्होंने आईएएस सेवा से इस्तीफे की घोषणा की थी। प्रशासनिक सेवा से राजनीति तक का उनका यह सफर अब एक नए मोड़ पर है।
आगे की राह आसान नहीं
दिव्या मित्तल के सामने एक ओर उनकी प्रशासनिक पहचान और लोगों का उत्साह है, तो दूसरी ओर चुनावी राजनीति की व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं। जनता के बीच पहुंचना और उनकी समस्याएं सुनना राजनीतिक यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन चुनाव जीतने के लिए इस जुड़ाव को संगठनात्मक मजबूती और स्पष्ट राजनीतिक कार्यक्रम में बदलना होगा।
मिर्जापुर में पिछले नौ दिनों से उनकी सक्रियता ने इतना जरूर स्पष्ट कर दिया है कि उनकी राजनीतिक पारी को लेकर लोगों में जिज्ञासा है। अब देखना होगा कि यह जिज्ञासा कितने व्यापक जनसमर्थन में बदलती है और ‘जन नीति भारत’ उत्तर प्रदेश की राजनीति में कितना प्रभाव स्थापित कर पाती है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या दिव्या मित्तल अपनी प्रशासनिक लोकप्रियता के दम पर पारंपरिक राजनीतिक दलों का समीकरण बदलेंगी, या चुनावी राजनीति की कसौटी पर उन्हें अभी लंबा रास्ता तय करना होगा?















