
मिर्जापुर सिंचाई विभाग में कथित वेतन-एरियर घोटाले से उठे सवाल, जांच के दायरे में आ सकती है पूरी भुगतान प्रक्रिया
बाबुओं के कथित सिंडिकेट पर शिकंजा कसने के साथ लेखा शाखा और कोषागार की भूमिका की जांच की मांग, अधिशासी अभियंता प्रमोद कुमार के कार्यकाल में मामला उजागर होना बना चर्चा का विषय

मिर्जापुर। सिंचाई विभाग में कथित फर्जी वेतन और एरियर भुगतान का मामला सामने आने के बाद विभागीय कार्यप्रणाली और सरकारी धन के भुगतान की प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं। मामले में 18 अक्टूबर को अधिशासी अभियंता प्रमोद कुमार की ओर से शहर कोतवाली में लिखित शिकायत दिए जाने के बाद प्राथमिकी दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। आरोप है कि विभाग के कुछ बाबुओं का एक सिंडिकेट फर्जी वेतन और एरियर के नाम पर सरकारी धनराशि के भुगतान में अनियमितता कर रहा था। मामले की गंभीरता को देखते हुए अब यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि कथित गड़बड़ी केवल लिपिकीय स्तर तक सीमित थी या भुगतान प्रक्रिया के अन्य स्तरों पर भी किसी प्रकार की चूक हुई।
अधिशासी अभियंता प्रमोद कुमार के कार्यकाल में मामला उजागर होना चर्चा में
इस पूरे प्रकरण में अधिशासी अभियंता प्रमोद कुमार के कार्यकाल में कथित घोटाले का प्रकाश में आना विभागीय स्तर पर निगरानी और वित्तीय अनियमितताओं को सामने लाने की कार्यक्षमता के रूप में देखा जा रहा है। यदि लंबे समय से इस तरह की गतिविधियां चल रही थीं, तो उनका सामने आना विभागीय अभिलेखों की जांच और अनियमितताओं को पकड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
बताया जा रहा है कि कथित तौर पर करीब दस वर्षों से इस प्रकार की गतिविधियां किए जाने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि, इस अवधि में वास्तव में कितने वर्षों तक अनियमित भुगतान हुआ, कितनी धनराशि का लेन-देन हुआ और इसमें कौन-कौन लोग शामिल थे, इसकी पुष्टि संबंधित अभिलेखों और जांच रिपोर्ट से ही हो सकेगी। यदि जांच में लंबे समय से चल रही गड़बड़ी की पुष्टि होती है, तो यह सवाल भी उठेगा कि पूर्व में विभागीय स्तर पर इसकी पहचान क्यों नहीं हो सकी।
लेखा नियंत्रक और कोषागार की भूमिका की जांच क्यों जरूरी?
कथित वेतन-एरियर घोटाले में जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि संबंधित बिल किसने तैयार किए, किस अधिकारी ने उनकी जांच की, किस स्तर पर स्वीकृति दी गई और भुगतान किन खातों में भेजा गया। वेतन और एरियर के भुगतान की प्रक्रिया में विभागीय लेखा शाखा, आहरण एवं वितरण अधिकारी तथा कोषागार की निर्धारित जिम्मेदारियां होती हैं। ऐसे में जांच के दौरान इन सभी स्तरों से संबंधित अभिलेखों का परीक्षण महत्वपूर्ण हो सकता है।
मिर्जापुर कोषागार में प्रस्तुत बिलों, भुगतान संबंधी रिकॉर्ड, स्वीकृति आदेशों और बैंक खातों के विवरण की जांच से यह स्पष्ट करने में मदद मिल सकती है कि कथित अनियमितता किस स्तर पर हुई। यदि किसी बिल में संदिग्ध कर्मचारी, गलत एरियर गणना, फर्जी विवरण या गलत बैंक खाते का उल्लेख था, तो यह देखना जरूरी होगा कि निर्धारित जांच प्रक्रिया का पालन हुआ था या नहीं।
हालांकि, केवल कोषागार से भुगतान होने अथवा किसी अधिकारी के हस्ताक्षर होने से उसकी संलिप्तता साबित नहीं होती। किसी भी अधिकारी या कर्मचारी की जिम्मेदारी साक्ष्यों, दस्तावेजों और उसकी वास्तविक भूमिका के आधार पर ही निर्धारित की जा सकती है।
दस वर्षों की भुगतान प्रक्रिया की जांच से खुल सकते हैं कई राज
यदि कथित घोटाले की अवधि करीब दस वर्ष तक जाती है, तो जांच एजेंसियों के सामने यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि इस दौरान कितने वेतन और एरियर बिल प्रस्तुत किए गए, कितने भुगतान संदिग्ध पाए गए और सरकारी खजाने को संभावित रूप से कितनी क्षति हुई। इसके लिए पुराने भुगतान अभिलेखों, कर्मचारी सेवा पुस्तिकाओं, एरियर स्वीकृति आदेशों, बैंक खातों तथा संबंधित डिजिटल रिकॉर्ड की जांच उपयोगी हो सकती है।
इस मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि क्या जांच केवल आरोपित बाबुओं तक सीमित रहेगी या सरकारी धन के भुगतान की पूरी प्रक्रिया की पड़ताल की जाएगी। यदि अनियमितता लंबे समय से जारी थी, तो संबंधित अवधि में जिम्मेदार पदों पर रहे अधिकारियों की भूमिका और निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता का परीक्षण भी आवश्यक होगा।
फिलहाल मामले में सामने आए आरोपों की पुष्टि जांच और संबंधित दस्तावेजों के आधार पर होनी है। जांच का निष्कर्ष ही यह स्पष्ट कर सकेगा कि कथित घोटाले में कितने लोग शामिल थे, सरकारी धनराशि का कितना नुकसान हुआ और विभागीय अथवा कोषागार स्तर पर कहीं कोई लापरवाही या मिलीभगत थी या नहीं।













