
सिंचाई विभाग में वर्षों से चल रहे वेतन घोटाले का खुलासा, लेखाकार और ट्रेजरी की भूमिका पर भी उठे सवाल
अधिशासी अभियंता प्रमोद कुमार की सक्रियता से सामने आया मामला, शहर कोतवाली में मुकदमा दर्ज; जांच के दायरे में जिम्मेदार अधिकारी भी आएं
मीरजापुर। सिंचाई विभाग में एरिया और वेतन के भुगतान में कथित अनियमितताओं को लेकर शहर कोतवाली में मुकदमा पंजीकृत होने के बाद विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। यदि इस मामले में कई वर्षों से अनियमितताएं होती रही हैं, तो यह केवल गड़बड़ी करने वाले कर्मचारियों तक सीमित मामला नहीं माना जा सकता। इसकी तह तक पहुंचने के लिए भुगतान की पूरी प्रक्रिया, अभिलेखों के सत्यापन और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच जरूरी है।
इस प्रकरण में सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता प्रमोद कुमार की सक्रियता की सराहना की जा रही है। उनके प्रयासों से कथित तौर पर लंबे समय से चली आ रही गड़बड़ी सामने आई। सरकारी धन से जुड़े मामलों में ऐसी सक्रियता महत्वपूर्ण है, क्योंकि समय रहते अनियमितताओं का पता चलने से न केवल दोषियों की पहचान संभव होती है, बल्कि भविष्य में इस तरह की घटनाओं पर अंकुश लगाने का रास्ता भी खुलता है।
हालांकि, इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि वेतन और एरिया के भुगतान में कई वर्षों से गड़बड़ी हो रही थी, तो संबंधित व्यवस्था में इसकी निगरानी करने वाले जिम्मेदार लोगों को इसकी जानकारी क्यों नहीं हुई? क्या अभिलेखों का नियमित सत्यापन नहीं किया गया? क्या भुगतान संबंधी दस्तावेजों की जांच निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार होती रही? इन सवालों के जवाब सामने आना जरूरी है।
लेखाकार की भूमिका की जांच क्यों नहीं?
वेतन भुगतान से संबंधित मामलों में लेखाकार की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में जांच एजेंसियों को यह पता लगाना चाहिए कि संबंधित लेखाकार की जिम्मेदारी क्या थी, किन अभिलेखों का सत्यापन किया गया और भुगतान के लिए प्रस्तुत दस्तावेजों की जांच किस स्तर पर हुई। यदि किसी स्तर पर लापरवाही, नियमों की अनदेखी अथवा जानबूझकर अनियमितता के प्रमाण मिलते हैं, तो संबंधित व्यक्ति की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि कथित गड़बड़ी कितने समय से चल रही थी, भुगतान किस आधार पर किया गया और क्या किसी अधिकारी या कर्मचारी ने इस संबंध में पहले कोई आपत्ति दर्ज कराई थी। केवल मुकदमा दर्ज हो जाना पर्याप्त नहीं है; मामले की निष्पक्ष जांच के जरिए प्रत्येक जिम्मेदार व्यक्ति की भूमिका स्पष्ट होना आवश्यक है।
मीरजापुर ट्रेजरी की भूमिका भी जांच के दायरे में आए
इस प्रकरण में मीरजापुर स्थित कोषागार (ट्रेजरी) की भूमिका को लेकर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि, केवल वेतन भुगतान होने के आधार पर कोषागार के किसी अधिकारी या कर्मचारी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन यदि संबंधित भुगतान कोषागार की जांच और स्वीकृति प्रक्रिया से होकर गुजरे थे, तो जांच में यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि वहां किस प्रकार के दस्तावेजों का सत्यापन हुआ और निर्धारित नियमों का पालन किया गया या नहीं।
क्या भुगतान से संबंधित अभिलेखों की जांच में कोई विसंगति सामने आई थी? क्या प्रस्तुत बिलों और स्वीकृत विवरणों का मिलान किया गया था? क्या ऐसी कोई प्रक्रिया थी जिसके माध्यम से कथित अनियमितताओं को पहले ही पकड़ा जा सकता था? इन बिंदुओं पर जांच होने से ही यह पता चल सकेगा कि गड़बड़ी कहां हुई और निगरानी व्यवस्था में कहीं कोई कमी तो नहीं रही।
दोषियों पर कार्रवाई के साथ व्यवस्था की जवाबदेही भी हो तय
इस मामले की जांच केवल कथित रूप से गड़बड़ी करने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह भी देखा जाना चाहिए कि विभागीय स्तर पर निगरानी की क्या व्यवस्था थी और भुगतान की प्रक्रिया में शामिल विभिन्न स्तरों पर किसकी क्या जिम्मेदारी थी। यदि जांच में किसी कर्मचारी, लेखाकार, अधिकारी अथवा अन्य संबंधित व्यक्ति की भूमिका सामने आती है, तो साक्ष्यों और नियमानुसार उसके विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए।
अधिशासी अभियंता प्रमोद कुमार की सक्रियता से यदि वर्षों से चली आ रही अनियमितता उजागर हुई है, तो यह विभागीय जवाबदेही की दिशा में सराहनीय कदम है। अब आवश्यक है कि जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध हो, ताकि सरकारी धन से जुड़ी कथित गड़बड़ी की पूरी सच्चाई सामने आ सके।
सबसे अहम सवाल यही है कि जब कथित अनियमितताएं लंबे समय से जारी थीं, तो उन्हें रोकने और पकड़ने की जिम्मेदारी जिन स्तरों पर थी, वहां क्या हो रहा था? इस सवाल का जवाब मिलने पर ही स्पष्ट होगा कि मामला केवल कुछ लोगों की कथित गड़बड़ी का है या निगरानी व्यवस्था में भी गंभीर खामियां थीं।















