
गौशालाओं के गोबर से तैयार हो रही वर्मी कंपोस्ट, महिलाओं को मिल रहा रोजगार
मीरजापुर। जनपद की गौशालाएं अब सिर्फ निराश्रित गोवंश के संरक्षण का केंद्र नहीं रहीं, बल्कि महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता का माध्यम भी बनती जा रही हैं। प्रदेश सरकार की पहल पर जिले के 49 गोवंश आश्रय स्थलों में संरक्षित गोवंश से निकलने वाले गोबर का उपयोग कर स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाएं वर्मी कंपोस्ट तैयार कर रही हैं। इससे एक ओर जैविक खेती को बढ़ावा मिल रहा है, वहीं दूसरी ओर महिलाओं को रोजगार और आय का नया स्रोत भी प्राप्त हो रहा है।
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के उपायुक्त (स्वत: रोजगार) रमाशंकर सिंह ने बताया कि जिले के 12 विकासखंडों में एक-एक गौशाला का चयन वर्मी कंपोस्ट निर्माण के लिए किया गया है। यहां स्वयं सहायता समूह की महिलाएं गौशालाओं से एकत्र गोबर को बड़े गड्ढों में डालकर नियमित रूप से पानी का छिड़काव करती हैं। इसके बाद उसमें केंचुए डालकर प्राकृतिक खाद तैयार की जाती है। वर्मी कंपोस्ट तैयार होने में लगभग 45 से 60 दिन का समय लगता है।
उन्होंने बताया कि मार्च माह से संचालित वर्मी कंपोस्ट यूनिटों में अब तक 5751 किलो वर्मी कंपोस्ट तैयार की जा चुकी है। इस जैविक खाद की मांग किसानों के बीच लगातार बढ़ रही है। किसान सीधे गौशालाओं से वर्मी कंपोस्ट खरीद सकते हैं। इसके अलावा स्वयं सहायता समूह की महिलाएं इसे वन विभाग, उद्यान विभाग और एफपीओ को 10 रुपये प्रति किलो की दर से बेच रही हैं।
वर्मी कंपोस्ट की बिक्री से अब तक महिलाओं को 35 हजार 888 रुपये की आय प्राप्त हो चुकी है। सबसे अधिक उत्पादन छानबे विकासखंड के विजयपुर स्थित वर्मी कंपोस्ट यूनिट में हुआ है, जहां अब तक 3100 किलो वर्मी कंपोस्ट तैयार की जा चुकी है।
विशेषज्ञों के अनुसार वर्मी कंपोस्ट मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के साथ-साथ जैविक खेती के लिए बेहद उपयोगी खाद मानी जाती है। इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता भी कम होती है।















