
प्रशासन में सख्त तेवर, दिल में संवेदना और आस्था—दिव्या मित्तल का मिर्जापुर से गहरा जुड़ाव
प्रशासक से आगे एक संवेदनशील इंसान थीं दिव्या मित्तल
मिर्जापुर की सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक स्थलों से रहा गहरा जुड़ाव, लोगों के बीच आज भी चर्चा में हैं उनके फैसले और संबोधन
मिर्जापुर। दिव्या मित्तल को मिर्जापुर में केवल एक कुशल प्रशासक के रूप में याद नहीं किया जा रहा, बल्कि उनके कार्यकाल से जुड़े लोग उन्हें एक नेक, संवेदनशील और न्यायप्रिय सोच रखने वाली अधिकारी के रूप में भी याद कर रहे हैं। प्रशासनिक जिम्मेदारियों के साथ सामाजिक सरोकार, सांस्कृतिक विरासत के प्रति लगाव और आध्यात्मिक चेतना उनके व्यक्तित्व के ऐसे पहलू रहे, जिनकी झलक उनके कार्यकाल के दौरान कई अवसरों पर देखने को मिली।
दिव्या मित्तल के संबोधनों में अक्सर केवल प्रशासनिक निर्देश ही नहीं, बल्कि लोगों को प्रेरित करने वाली बातें भी सुनने को मिलती थीं। वह समस्याओं को केवल फाइलों और आंकड़ों के नजरिए से देखने के बजाय उससे जुड़े लोगों की भावनाओं और परिस्थितियों को समझने पर भी जोर देती थीं। यही वजह रही कि आम लोगों के बीच उनकी कार्यशैली की अलग पहचान बनी।
राम गया घाट पर शिवलिंग स्थापना से आध्यात्मिक जुड़ाव
मिर्जापुर के विंध्याचल थाना क्षेत्र में स्थित राम गया घाट का भी दिव्या मित्तल के कार्यकाल की यादों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रसंग है। यहां भगवान शिव के शिवलिंग की स्थापना से जुड़े धार्मिक आयोजन में उन्होंने स्वयं सहभागिता की थी। यह शिवलिंग आज रामेश्वरम के नाम से प्रसिद्ध है।
रामेश्वरम शिवलिंग पर पूजा-अर्चना के दौरान दिव्या मित्तल का आध्यात्मिक रूप भी लोगों ने देखा। उस समय उनकी सहज श्रद्धा और एकाग्रता ने यह एहसास कराया कि प्रशासनिक दायित्वों के बीच भी उनके व्यक्तित्व में आध्यात्मिक पक्ष काफी गहरा था।
यही प्रसंग उनके व्यक्तित्व के उस पहलू को सामने लाता है, जिसमें प्रशासनिक कठोरता के साथ संवेदनशीलता और आध्यात्मिक सोच का भी समावेश दिखाई देता था। उनके करीब से काम करने वाले लोगों का मानना रहा कि वह जीवन और समाज से जुड़े विषयों को केवल प्रशासनिक नजरिए से नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से भी देखने का प्रयास करती थीं।
संकट घाट पर एक आह्वान और हट गया वर्षों पुराना अवरोध
शहर कोतवाली थाना क्षेत्र के संकट घाट से जुड़ा प्रसंग भी उनके कार्यकाल की चर्चित यादों में शामिल है। घाट के आसपास सड़क और आवागमन में अवरोध बन रहे अवैध कब्जों को लेकर जब उन्होंने लोगों से अपील की, तो उनके एक आह्वान पर लोगों ने स्वयं कब्जा छोड़ दिया। इसके बाद सड़क के चौड़ीकरण का रास्ता साफ हुआ और आवागमन को सुगमता मिली।
यह घटना केवल अतिक्रमण हटाने की प्रशासनिक कार्रवाई नहीं थी, बल्कि लोगों के साथ संवाद और विश्वास के जरिए समाधान निकालने की उनकी शैली का उदाहरण भी बनी। बिना किसी बड़े टकराव के लोगों को समझाकर रास्ता निकालना उनकी कार्यशैली की खासियतों में गिना गया।
मिर्जापुर की मिट्टी और विरासत से बना भावनात्मक रिश्ता
दिव्या मित्तल के मिर्जापुर से जुड़ाव को समझने के लिए उनके प्रशासनिक कार्यों के साथ-साथ जिले की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत के प्रति उनके दृष्टिकोण को भी देखना होगा। विंध्याचल की धार्मिक आस्था, गंगा घाटों की परंपरा और शहर की ऐतिहासिक-सांस्कृतिक पहचान जैसे विषयों से उनका जुड़ाव कई मौकों पर दिखाई दिया।
यही वजह है कि उनके स्थानांतरण और आगे की भूमिका को लेकर चर्चाओं के बीच मिर्जापुर में उनके कार्यकाल की यादें भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई हैं। एक अधिकारी के रूप में उनकी उपलब्धियों पर अलग-अलग राय हो सकती है, लेकिन उनके व्यक्तित्व का संवेदनशील और मानवीय पक्ष उन लोगों की स्मृतियों में जरूर दर्ज है, जिन्होंने उन्हें करीब से काम करते देखा।
कुशल प्रशासक के रूप में पहचान बनाने वाली दिव्या मित्तल के व्यक्तित्व का यह दूसरा पक्ष बताता है कि उनके लिए प्रशासन केवल आदेश और कार्रवाई तक सीमित नहीं था। संस्कृति, आस्था, समाज और आम आदमी से जुड़ाव भी उनकी कार्यशैली का हिस्सा रहा। शायद यही कारण है कि मिर्जापुर से उनका रिश्ता केवल एक प्रशासनिक कार्यकाल का रिश्ता न रहकर यहां की स्मृतियों और लोगों की चर्चाओं का हिस्सा बन गया।















