IAS की कुर्सी से जनता की चौपाल तक… दिव्या मित्तल की नई पारी कितनी बड़ी चुनौती?

IAS की कुर्सी से जनता की चौपाल तक… दिव्या मित्तल की नई पारी कितनी बड़ी चुनौती?

13 साल की प्रशासनिक सेवा के बाद राजनीति में कदम, किसी दल का दामन थामने से इनकार; मिर्जापुर बना सियासी कहानी का सबसे अहम अध्याय

मीरजापुर/लखनऊ।
एक महीने पहले तक जिस नाम की पहचान एक तेजतर्रार आईएएस अधिकारी के रूप में थी, अब वही नाम उत्तर प्रदेश की राजनीति में संभावनाओं का नया अध्याय लिखने की तैयारी में है। 2013 बैच की आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने 13 साल की प्रशासनिक सेवा के बाद 30 अगस्त को इस्तीफा दिया और अब उन्होंने अपनी अगली मंजिल भी साफ कर दी है—राजनीति।

लेकिन इस कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि दिव्या मित्तल ने किसी राजनीतिक दल का झंडा थामने के बजाय फिलहाल जनता के बीच से अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने का फैसला किया है। 29 सितंबर को जारी वीडियो संदेश में उन्होंने उत्तर प्रदेश को अपनी ‘कर्मभूमि’ बताते हुए कहा कि उनकी राजनीति का उद्देश्य पद हासिल करना नहीं, बल्कि उन लोगों की आवाज बनना है जिनकी बात अक्सर सरकारी दफ्तरों तक नहीं पहुंच पाती।

IAS से राजनीति तक—कहानी में अचानक आया मोड़ नहीं

दिव्या मित्तल का सफर सामान्य प्रशासनिक अधिकारी जैसा नहीं रहा। IIT दिल्ली और IIM बेंगलुरु से पढ़ाई के बाद उन्होंने विदेश में नौकरी की, लेकिन बाद में UPSC के रास्ते प्रशासनिक सेवा में आईं। उत्तर प्रदेश में उन्होंने संत कबीरनगर, मिर्जापुर और देवरिया जैसे जिलों में जिलाधिकारी की जिम्मेदारी संभाली। बाद में वह राजस्व विभाग में विशेष सचिव के पद पर तैनात हुईं।

30 अगस्त को इस्तीफा देने के बाद करीब एक महीने तक उनके अगले कदम को लेकर अटकलों का दौर चलता रहा। अब तस्वीर साफ हो चुकी है। उन्होंने राजनीति में आने की घोषणा तो की है, लेकिन किसी स्थापित राजनीतिक दल के साथ जाने की घोषणा नहीं की। उनका कहना है कि वह जनता के साथ मिलकर ऐसा मंच बनाना चाहती हैं जहां आम लोगों की समस्याएं सीधे राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनें।

मिर्जापुर क्यों बना उनकी कहानी का सबसे मजबूत अध्याय?

दिव्या मित्तल की राजनीतिक कहानी में मिर्जापुर का स्थान महज एक पुराने कार्यक्षेत्र का नहीं, बल्कि एक भावनात्मक और राजनीतिक पूंजी का है।

मिर्जापुर में जिलाधिकारी रहते हुए पहाड़ी क्षेत्र के लहुरियादह गांव तक पेयजल पहुंचाने का मामला उनकी प्रशासनिक पहचान से जुड़ा। अब राजनीति में प्रवेश की घोषणा करते हुए उन्होंने इसी मिर्जापुर के अनुभव को उदाहरण बनाया।

उन्होंने बताया कि लहुरियादह में एक महिला ने उनसे अपने गांव में बेहतर स्कूल की मांग की थी। जांच में पता चला कि स्कूल को मंजूरी मिल चुकी थी, लेकिन वर्षों बाद भी निर्माण शुरू नहीं हुआ। उनके अनुसार समस्या केवल मंजूरी की नहीं, बल्कि सरकारी फैसलों को जमीन पर उतारने की नीयत और व्यवस्था की थी।

यही बात अब उनकी राजनीतिक सोच का आधार बनती दिखाई दे रही है—फाइल में मंजूरी और जमीन पर काम के बीच की दूरी को राजनीति का मुद्दा बनाना।

इत्तेफाक देखिए कि उनके वीडियो के बाद लहुरियादह के विद्यालय निर्माण का काम शुरू होने और 25.58 लाख रुपये का बजट जारी होने की खबर भी सामने आई। इससे उनकी पुरानी प्रशासनिक भूमिका और वर्तमान राजनीतिक सक्रियता के बीच एक दिलचस्प कड़ी बन गई है।

राजनीतिक विश्लेषण : क्या बिना दल के राजनीति संभव है?

यहीं से दिव्या मित्तल की राजनीतिक यात्रा सबसे कठिन और सबसे दिलचस्प बनती है।

उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और बेहद प्रतिस्पर्धी राजनीतिक राज्य में बिना किसी राजनीतिक दल के अपनी जगह बनाना आसान नहीं है। चुनावी राजनीति में संगठन, कार्यकर्ता, बूथ नेटवर्क, संसाधन और स्थानीय सामाजिक समीकरण बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। दूसरी ओर दिव्या मित्तल के पास एक अलग तरह की पूंजी है—प्रशासनिक अनुभव, चर्चित सार्वजनिक छवि और सोशल मीडिया पर अपनी बात सीधे जनता तक पहुंचाने की क्षमता।

उनकी चुनौती यह होगी कि प्रशासनिक लोकप्रियता को राजनीतिक जनाधार में कैसे बदला जाए।

किसी जिले का लोकप्रिय जिलाधिकारी होना और चुनाव जीतने वाला नेता होना दो अलग-अलग बातें हैं। अधिकारी के रूप में निर्णय लेने की शक्ति प्रशासनिक व्यवस्था से आती है, जबकि राजनेता के रूप में वही प्रभाव जनता के भरोसे, संगठन और राजनीतिक संघर्ष से अर्जित करना पड़ता है।

यही कारण है कि दिव्या मित्तल के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि वह राजनीति में क्यों आईं, बल्कि यह है कि क्या वह अपनी प्रशासनिक पहचान को एक स्थायी राजनीतिक आंदोलन में बदल पाएंगी?

2027 का चुनाव और बढ़ती दिलचस्पी

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 के पहले उनका राजनीति में प्रवेश अपने आप में महत्वपूर्ण है। उनके इस्तीफे के समय ही राजनीतिक गलियारों में अलग-अलग तरह की चर्चाएं शुरू हो गई थीं। विपक्ष ने उनके इस्तीफे को लेकर सरकार पर सवाल उठाए, जबकि सत्ता पक्ष की ओर से भी राजनीतिक दावे सामने आए। हालांकि उस समय दिव्या मित्तल ने राजनीति में आने की बात से इनकार किया था। अब उन्होंने स्वयं राजनीतिक यात्रा की घोषणा कर दी है।

फिलहाल उन्होंने किसी दल में शामिल होने से इनकार किया है। इसका अर्थ यह नहीं कि भविष्य में राजनीतिक समीकरण बदल नहीं सकते। उत्तर प्रदेश की राजनीति में स्वतंत्र राजनीतिक मंच से शुरुआत और बाद में किसी बड़े दल से गठजोड़ कोई असंभव संभावना नहीं है। लेकिन अभी उनके घोषित रुख को ही आधार मानना उचित होगा।

मिर्जापुर से चुनाव? चर्चा तेज, फैसला अभी बाकी

दिव्या मित्तल का नाम मिर्जापुर से संभावित चुनावी राजनीति को लेकर भी चर्चा में है। इसकी वजह स्पष्ट है—मिर्जापुर में उनके प्रशासनिक कार्यकाल की मजबूत पहचान और जनता के एक वर्ग में बनी सकारात्मक छवि।

लेकिन यहां भी सावधानी जरूरी है। अभी उन्होंने मिर्जापुर से चुनाव लड़ने की आधिकारिक घोषणा नहीं की है। इसलिए इसे राजनीतिक संभावना से आगे बढ़ाकर तथ्य के रूप में देखना जल्दबाजी होगी।

फिर भी राजनीतिक दृष्टि से मिर्जापुर उनके लिए स्वाभाविक शुरुआती मैदान क्यों माना जा रहा है, इसे समझना मुश्किल नहीं है। यहां उन्हें किसी नए चेहरे की तरह अपना परिचय नहीं देना पड़ेगा। प्रशासनिक कार्यकाल की यादें पहले से मौजूद हैं।

दिव्या मित्तल के सामने तीन बड़ी परीक्षाएं

पहली—प्रशासनिक छवि को राजनीतिक विश्वसनीयता में बदलना।
अधिकारी के रूप में लिए गए फैसलों और नेता के रूप में लिए जाने वाले राजनीतिक फैसलों में बड़ा अंतर होता है।

दूसरी—संगठन खड़ा करना।
सोशल मीडिया की लोकप्रियता चुनावी बूथ तक तभी पहुंचती है जब उसके पीछे जमीनी कार्यकर्ता और लगातार जनता के बीच मौजूदगी हो।

तीसरी—राजनीतिक पहचान तय करना।
यदि वह किसी दल में नहीं जाती हैं तो उन्हें अपनी विचारधारा, मुद्दे और संगठन का स्पष्ट मॉडल जनता के सामने रखना होगा। केवल ‘व्यवस्था बदलने’ का नारा लंबे समय तक पर्याप्त नहीं होता।

क्या यह नई राजनीति की शुरुआत है?

दिव्या मित्तल की घोषणा को केवल एक पूर्व आईएएस अधिकारी के राजनीति में आने की खबर मानना शायद पूरी कहानी नहीं होगी।

असल सवाल यह है कि क्या प्रशासनिक अनुभव से निकला कोई चेहरा राजनीति में ‘सिस्टम के भीतर से बदलाव’ की जगह ‘सिस्टम के बाहर से बदलाव’ का मॉडल खड़ा कर सकता है?

उनका संदेश फिलहाल यही संकेत देता है कि वह पारंपरिक राजनीति की बजाय नागरिकों की समस्याओं को केंद्र में रखकर शुरुआत करना चाहती हैं। उन्होंने लोगों से किसी एक ‘मसीहा’ का इंतजार न करने और स्वयं बदलाव की प्रक्रिया का हिस्सा बनने की अपील भी की है।

अब देखना यह होगा कि यह आवाज कितनी दूर तक पहुंचती है।

IAS की कुर्सी छोड़ना उनका पहला बड़ा फैसला था। राजनीति में अपनी जमीन बनाना उससे कहीं बड़ी परीक्षा होगी। और इस परीक्षा का पहला सवाल शायद यही होगा—क्या प्रशासन में बनी लोकप्रियता, जनता के बीच राजनीतिक जनाधार बन सकती है?

मिर्जापुर से शुरू हुई उनकी प्रशासनिक कहानी अब उत्तर प्रदेश की राजनीति में किस मोड़ तक पहुंचती है, यह आने वाले महीनों में साफ होगा।

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